वांछित मन्त्र चुनें

इन्द्रा॑ग्नी तवि॒षाणि॑ वां स॒धस्था॑नि॒ प्रयां॑सि च। यु॒वोर॒प्तूर्यं॑ हि॒तम्॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrāgnī taviṣāṇi vāṁ sadhasthāni prayāṁsi ca | yuvor aptūryaṁ hitam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑। त॒वि॒षाणि॑। वा॒म्। स॒धऽस्था॑नि। प्रयां॑सि। च॒। यु॒वोः। अ॒प्ऽतूर्य॑म्। हि॒तम्॥

ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:12» मन्त्र:8 | अष्टक:3» अध्याय:1» वर्ग:12» मन्त्र:3 | मण्डल:3» अनुवाक:1» मन्त्र:8


बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर राजधर्म विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्द्राग्नी) वायु बिजुली के सदृश ऐक्यमत से वर्त्तमान सेना और सेना के मुख्य अधिष्ठाता ! (वाम्) आप दोनों के (सधस्थानि) तुल्य स्थान में विद्यमान (प्रयांसि) कामना करने योग्य (तविषाणि) बल पराक्रम (च) और (युवोः) आपदोनों के (अप्तूर्य्यम्) कर्म करने के लिये शीघ्रता (हितम्) सुखसाधक हो ॥८॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो वायु और बिजुली के संयोग के समान परस्पर सेना और सेना के स्वामी प्रेमभाव से विरोध छोड़ के वर्त्ताव करें, तो संपूर्ण मनोरथ सिद्ध हों ॥८॥
बार पढ़ा गया

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुना राजधर्मविषयमाह।

अन्वय:

हे इन्द्राग्नी वायुविद्युताविव वर्त्तमानौ सेनासेनाध्यक्षौ ! वां सधस्थानि प्रयांसि तविषाणि च युवोरप्तूर्य्यं हितं भवतु ॥८॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्राग्नी) वायुविद्युताविव सेनासेनाध्यक्षौ (तविषाणि) बलानि (वाम्) युवयोः (सधस्थानि) समानस्थानानि (प्रयांसि) कमनीयानि (च) (युवोः) (अप्तूर्य्यम्) कर्मानुष्ठानाय त्वरितव्यम् (हितम्) सुखसाधकम् ॥८॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यदि वायुविद्युत्संयोगवत्सेनासेनाध्यक्षावविरुद्धौ स्यातां तर्हि सर्वे कामाः सिध्येयुः ॥८॥
बार पढ़ा गया

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे वायू व विद्युतच्या संयोगाप्रमाणे सेना व सेनेचा स्वामी विरोध सोडून परस्पर प्रेमाने व्यवहार करतील तर संपूर्ण मनोरथ सिद्ध होतील. ॥ ८ ॥